सब्स्टेंटिव मोशन और प्रिविलेज मोशन आजकल राहुल गांधी से जोड़कर देखे जा रहे हैं. सरकार इन दोनों का प्रयोग कर राहुल गांधी पर संवैधानिक और संसदीय दबाव बनाना चाहती है. यह सारी प्रक्रिया शुरू हुई राष्ट्रपति के धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा से, जब राहुल गांधी ने पूर्व सेना अध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की किताब को संसद में कोट करना चाहा. लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने इसकी अनुमति नहीं दी क्योंकि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और गृहमंत्री अमित शाह ने आपत्ति जताई कि किताब अभी प्रकाशित नहीं हुई है, इसलिए इसे कोट नहीं किया जा सकता.
इसके बाद ट्रेड डील और एक्सट्रीम फाइल्स को लेकर जिस तरह से मामला सामने आया, राहुल गांधी ने सरकार पर कई गंभीर आरोप लगाए. सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि राहुल गांधी की सभी बातें बेबुनियाद हैं और इनमें किसी भी तरह की कोई सच्चाई नहीं है. इसके बाद केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने एक प्रेस वार्ता में कहा कि वह राहुल गांधी के खिलाफ प्रिविलेज मोशन यानी विशेष अधिकार प्रस्ताव लाएंगे.
प्रिविलेज मोशन और सब्स्टेंटिव मोशन क्या है
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 105 के अंतर्गत सांसदों को संसद में बोलने की विशेष छूट प्रदान की गई है. लेकिन यदि झूठ या भ्रामक बात बोली जाए तो लोकसभा नियम 222 और राज्यसभा नियम 187 के अंतर्गत कमेटी बनाई जाती है. लोकसभा की कमेटी में 15 और राज्यसभा की कमेटी में 10 सदस्य होते हैं. कमेटी सारे तथ्यों की जांच करेगी और बोलने का पूरा मौका मिलेगा. दोषी पाए जाने पर माफी, निंदा या सदस्यता जाने तक की कार्रवाई हो सकती है. वहीं सब्स्टेंटिव मोशन प्रिविलेज मोशन से थोड़ा ज्यादा बड़ा हो सकता है क्योंकि इसमें कोई कमेटी नहीं बनती, बल्कि सदन में सीधी चर्चा और वोटिंग होती है.
निशिकांत दुबे का सब्स्टेंटिव मोशन
गोड्डा से बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने सब्स्टेंटिव मोशन चेयर को सौंपा है. यदि चेयर इसे मंजूर कर लेते हैं तो सदन में सीधी चर्चा और वोटिंग होगी. इसके प्रभाव जरूर पड़ सकते हैं. सूत्रों के मुताबिक सरकार प्रिविलेज मोशन नहीं ला रही है. सब्स्टेंटिव मोशन पर अभी कोई स्पष्ट निर्देश नहीं आए हैं.
दूसरी बार सदस्यता खतरे में
यह दूसरा मौका है जब राहुल गांधी की संसद सदस्यता पर खतरा मंडरा रहा है. इससे पहले 2019 में राहुल गांधी द्वारा दिए गए एक चुनाव भाषण में कहा था कि सारे मोदी सरनेम वाले चोर क्यों होते हैं. सूरत की कोर्ट ने उन्हें दोषी माना और 2 साल की सजा सुनाई. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के तहत दो साल या उससे अधिक की सजा होने पर सदस्यता या चुनाव लड़ने पर रोक लगाई जा सकती है, जिसकी वजह से राहुल गांधी की सदस्यता चली गई थी. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले पर रोक लगाई और लोकसभा सचिवालय ने उनके सदस्य रहने की रोक हटा दी.
राहुल गांधी की चुनौती
राहुल गांधी ने एक के बाद एक वीडियो पोस्ट करते हुए कहा कि आप मेरे खिलाफ FIR कर लीजिए, कोई भी प्रस्ताव ले लीजिए, लेकिन मैं अपनी बात संसद में उठाता रहूंगा. अब देखना यह होगा कि चेयर सब्स्टेंटिव मोशन पर क्या फैसला लेते हैं और यह संसदीय विवाद आगे किस दिशा में जाता है.
