देश करीबन 200 साल तक अंग्रेजों के अधीन रहा। तब जाकर यह स्वाधीनता मिली। कितने ही लोगों ने अपने प्राणों की आहुति देकर इस देश के निर्माण में अपना योगदान दिया। लेकिन कोई भी देश केवल स्वतंत्रता प्राप्त कर लेने से स्वतंत्र नहीं होता। वो स्वतंत्र होता है जब उसके विचार स्वतंत्र होते हैं। और इस विचार के स्वतंत्र होने में कई महत्वपूर्ण दिवस हैं, लेकिन उसमें 24 जनवरी की अपनी एक खास जगह है।
24 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान सभा का अंतिम दिन माना जाता है। यही वो तारीख थी और दिन था जिसने 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के रूप में स्थापित किया।
24 जनवरी को भारत ने जन गण मन को अपना राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया। यही वो दिन था जिस दिन देश के पहले राष्ट्रपति के नाम पर प्रस्ताव रखा गया।
यही वो दिवस था जिस दिन संविधान सभा के 284 सदस्यों ने संविधान पर हस्ताक्षर कर उसे स्वीकार करने की मंजूरी दी। संविधान सभा का सफर 389 सदस्यों से शुरू हुआ था। लेकिन जिन्ना की पाकिस्तान को लेकर माँग और देशी रियासतों के स्वतंत्र रहने की माँग ने इस संख्या को 299 सदस्यों तक पहुँचा दिया।
299 सदस्यों में से 284 सदस्य 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा में मौजूद थे, जिन्होंने इस पर हस्ताक्षर किए। बाकी 15 सदस्य उस दिन सभा में मौजूद नहीं थे।
संविधान सभा की हर चर्चा को 12 खंडों में रिकॉर्ड किया गया।
12वें खंड के 12.167.45 में संविधान सभा के अध्यक्ष और देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद कहते हैं –
“मैं माननीय सदस्यों से निवेदन करता हूँ कि आप अपनी जगह पर बैठे रहें। सबके नाम पुकारे जाएँगे और वे आकर हस्ताक्षर करेंगे।”
उसके बाद वंदे मातरम और राष्ट्रगान हुआ।
इन सभी मौजूद सदस्यों ने 24 जनवरी 1950 को संविधान पर हस्ताक्षर किए।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी अंतिम खंड 12.167.51 में कहते हैं – “सदन अब अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होता है।”
