अभिनव बिंद्रा के नेतृत्व वाली विशेष टास्क फोर्स ने सरकार को सौंपी गई अपनी 170 पन्नों की रिपोर्ट में भारतीय खेल प्रशासन की एक डरावनी तस्वीर पेश की है। रिपोर्ट का सबसे कड़वा सच यह है कि भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) और राज्यों के खेल विभागों का प्रबंधन ऐसे “सामान्य प्रशासनिक अधिकारियों” के हाथों में है, जिन्हें खेल-विशिष्ट विशेषज्ञता (Sport-specific expertise) का कोई ज्ञान नहीं है।

इस कमी का सीधा खामियाजा खिलाड़ियों और खेल संस्थाओं को भुगतना पड़ रहा है। विशेषज्ञता के अभाव में लिए गए तदर्थ (Ad-hoc) निर्णय, कमजोर संस्थागत याददाश्त और पेशेवर दृष्टिकोण की कमी भारत के खेल भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रही है।
विशेषज्ञता की कमी: क्यों पिछड़ रहे हैं खेल विभाग?
टास्क फोर्स ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि नौकरशाह खेल पारिस्थितिकी तंत्र के कार्यान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन खेल की तकनीकी समझ न होने के कारण वे प्रभावी निर्णय नहीं ले पाते। इसके समाधान के लिए टास्क फोर्स ने निम्नलिखित सुझाव दिए हैं:
- ब्यूरोक्रेट्स के लिए अनिवार्य स्पोर्ट्स ट्रेनिंग: आईएएस (IAS) और राज्य कैडर के अधिकारियों के लिए करियर के हर स्तर पर खेल शासन (Sports Governance) का विशेष प्रशिक्षण अनिवार्य किया जाए।
- अकादमिक स्तर पर सुधार: सिविल सेवा प्रशिक्षण अकादमियों में खेल प्रबंधन के पाठ्यक्रम को जोड़ा जाए ताकि भविष्य के अधिकारी केवल ‘सामान्य प्रशासक’ न रहकर ‘खेल विशेषज्ञ’ भी बन सकें।
NCSECB: खेल प्रशासन को ‘प्रोफेशनल’ बनाने का हथियार

प्रशासन में व्याप्त गैर-पेशेवर रवैये को खत्म करने के लिए नेशनल काउंसिल फॉर स्पोर्ट्स एजुकेशन एंड कैपेसिटी बिल्डिंग (NCSECB) के गठन का प्रस्ताव दिया गया है।
- यह एक स्वायत्त वैधानिक निकाय होगा जो खेल प्रशासन के लिए शिक्षा और सक्षमता का मानक तय करेगा।
- यह परिषद सुनिश्चित करेगी कि पदों पर नियुक्ति वरिष्ठता या रसूख के आधार पर नहीं, बल्कि प्रमाणित योग्यता (Competence) के आधार पर हो।
खेल महासंघों (NSFs) की मनमानी पर प्रहार
रिपोर्ट ने राष्ट्रीय खेल महासंघों (NSFs) की भी कड़ी आलोचना की है। विशेषज्ञता की कमी के कारण ये महासंघ “बंद पारिस्थितिकी तंत्र” बन गए हैं जहाँ चुनिंदा लोगों का वर्चस्व है।
- प्रबंधन और शासन का पृथक्करण: टास्क फोर्स ने मांग की है कि महासंघों के दैनिक कामकाज के लिए पेशेवर सीईओ (CEO) और डोमेन विशेषज्ञों की नियुक्ति हो।
- निर्णय प्रक्रिया में बदलाव: वित्तीय और प्रशासनिक निर्णयों को निर्वाचित पदाधिकारियों के चंगुल से निकालकर पेशेवरों के हाथ में दिया जाए।
खिलाड़ियों का नुकसान और भविष्य की राह
रिपोर्ट के अनुसार, खेल प्रशासकों को खेल की समझ न होने के कारण सबसे अधिक नुकसान एथलीटों को होता है। उनकी जरूरतों और ट्रेनिंग की वैज्ञानिक समझ के अभाव में गलत नीतियां बनती हैं। इसे सुधारने के लिए “डुअल एथलीट करियर पाथवे” का सुझाव दिया गया है, ताकि पूर्व खिलाड़ी खुद प्रशिक्षित होकर प्रशासन की कमान संभाल सकें।
निष्कर्ष: सिस्टम की मजबूती ही पदक की गारंटी
बिंद्रा टास्क फोर्स की यह रिपोर्ट इस चेतावनी के साथ समाप्त होती है कि 2036 ओलंपिक का सपना पुराने और अप्रशिक्षित ढांचे के साथ पूरा नहीं हो सकता। जैसा कि अभिनव बिंद्रा ने कहा, “पदक केवल प्रतिभा से नहीं, बल्कि प्रणालियों (Systems) से पैदा होते हैं।” यदि भारत को वैश्विक खेल महाशक्ति बनना है, तो खेल प्रशासन को नौकरशाही के ढर्रे से निकालकर विशेषज्ञों के हाथों में सौंपना ही होगा।
