महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के बीच मतभेदों का एक महत्वपूर्ण उदाहरण समाजवाद से जुड़ा हुआ है। नेहरू जी समाजवाद के प्रबल समर्थक थे और वे मानते थे कि भारत की गरीबी और पिछड़ेपन को दूर करने के लिए बड़े पैमाने पर औद्योगीकरण, राज्य नियंत्रित अर्थव्यवस्था और समाजवादी मॉडल अपनाना आवश्यक है।

वहीं, महात्मा गांधी ग्राम-स्वराज, विकेंद्रीकरण, छोटे-छोटे उद्योगों (जैसे चरखा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था) पर आधारित आत्मनिर्भर भारत की कल्पना करते थे।
वे बड़े उद्योगों और केंद्रीकृत समाजवाद को हिंसा पर आधारित मानते थे तथा इसे भारतीय संस्कृति के अनुरूप नहीं पाते थे।गांधीजी ने नेहरू की 1928-29 में तैयार की गई आर्थिक योजनाओं (जिसमें समाजवादी तत्व प्रमुख थे) पर खुलकर असहमति जताई थी।
उन्होंने नेहरू को कई पत्र लिखे, जिनमें वैचारिक अंतर को स्पष्ट रूप से व्यक्त किया। एक प्रमुख उदाहरण 1928 का वह पत्र है, जिसमें गांधीजी ने लिखा था कि उनके और नेहरू के बीच दृष्टिकोण का मौलिक अंतर है। गांधीजी ने कहा था कि यदि यह अंतर मूलभूत है, तो जनता को भी इसकी जानकारी होनी चाहिए, क्योंकि स्वराज के कार्य में इसे छिपाना हानिकारक होगा।
उन्होंने हिंद स्वराज में वर्णित विकेंद्रीकृत व्यवस्था पर अपनी अटल आस्था दोहराई और नेहरू की आधुनिक औद्योगिक सोच से असहमति जताई।एक अन्य महत्वपूर्ण प्रसंग में, जब नेहरू ने समाजवाद के प्रति अपनी मजबूत प्रतिबद्धता व्यक्त की और गांधीजी को पत्र लिखे, तो गांधीजी ने तीखा लेकिन सम्मानपूर्ण प्रत्युत्तर दिया।
गांधीजी ने लिखा था (लगभग इसी भाव में):”तुम्हारे और मेरे बीच मतभेद बहुत गहरे और विस्तृत हो चुके हैं। लगता है अब हमारी सहमति किसी मामले पर भी नहीं बनने वाली। मैं तुम जैसे जांबाज को खो देने का दुख छिपा नहीं सकता,
कि मैं एक दिलेर, पराक्रमी, अति विश्वसनीय, बेहद प्रतिभाशाली और बहुत ईमानदार व्यक्ति (जैसे तुम सदा से हो) को खोने जा रहा हूँ। लेकिन एक महान कार्य के लिए जांबाजों की कुर्बानी देनी पड़ती है।
