March 10, 2026

“भारतीय फुटबॉल को बचाएं”: सुनील छेत्री और सितारों की गुहार, ‘स्थायी पक्षाघात’ के बीच फीफा से हस्तक्षेप की मांग

“भारतीय फुटबॉल को बचाएं”: सुनील छेत्री और सितारों की गुहार, ‘स्थायी पक्षाघात’ के बीच फीफा से हस्तक्षेप की मांग

भारतीय फुटबॉल वर्तमान में अपने इतिहास के सबसे अंधकारमय दौर से गुजर रहा है। देश की शीर्ष स्तरीय लीग, इंडियन सुपर लीग (ISL) के 2025-26 सीजन के भविष्य पर मंडराते काले बादलों के बीच, देश के सबसे बड़े फुटबॉल सितारों ने विश्व फुटबॉल की सर्वोच्च संस्था, फीफा (FIFA) से तत्काल हस्तक्षेप की अपील की है।

सुनील छेत्री, गुरप्रीत सिंह संधू और संदेश झिंगन सहित कई दिग्गजों ने एक संयुक्त वीडियो संदेश जारी कर भारतीय फुटबॉल की वर्तमान स्थिति को “मानवीय, खेल और आर्थिक संकट” करार दिया है।

खिलाड़ियों की पीड़ा: “हम डर और हताशा में हैं”

आमतौर पर सितंबर या अक्टूबर में शुरू होने वाली ISL का नया सीजन जनवरी 2026 आने के बावजूद शुरू नहीं हो सका है। इस अनिश्चितता ने सैकड़ों खिलाड़ियों और कर्मचारियों के भविष्य को अधर में लटका दिया है।

  • गुरप्रीत सिंह संधू ने अपना दर्द साझा करते हुए कहा, “यह जनवरी है और हमें मैदान पर होना चाहिए था, लेकिन इसके बजाय हम यहाँ डर और हताशा से भरे हुए हैं।”
  • सुनील छेत्री ने जोर देकर कहा कि खिलाड़ी, प्रशंसक और क्लब मालिक एक स्पष्ट भविष्य के हकदार हैं।
  • विदेशी खिलाड़ी हुगो बौमस ने भी ज्यूरिख स्थित फीफा मुख्यालय से मदद की गुहार लगाई है ताकि भारतीय फुटबॉल को डूबने से बचाया जा सके।

प्रशासनिक विफलता और “स्थायी पक्षाघात”

खिलाड़ियों ने सीधे तौर पर अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ (AIFF) की कार्यक्षमता पर कड़े सवाल उठाए हैं। उनके बयान के अनुसार, शासी निकाय अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में पूरी तरह विफल रहा है, जिससे भारतीय फुटबॉल ‘स्थायी पक्षाघात’ (Permanent Paralysis) की स्थिति में पहुँच गया है। खिलाड़ियों का कहना है कि उनकी यह मांग राजनीतिक नहीं, बल्कि अस्तित्व बचाने की एक मजबूरी है।


संकट की जड़: टेंडर की विफलता और व्यावसायिक विवाद

यह संकट मुख्य रूप से AIFF और उसके वाणिज्यिक भागीदार FSDL के बीच 15 साल के ‘मास्टर राइट्स एग्रीमेंट’ के समाप्त होने के बाद शुरू हुआ।

  1. बोलीदाताओं की कमी: सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद नए टेंडर जारी किए गए, लेकिन ISL के वाणिज्यिक अधिकारों को खरीदने के लिए किसी भी बड़ी कंपनी ने रुचि नहीं दिखाई।
  2. प्रायोजकों का अभाव: अधिकारों के मुद्रीकरण (Monetization) में विफलता के कारण लीग का आयोजन ठप पड़ा है।

आर्थिक प्रभाव: निवेश का बाहर जाना और खिलाड़ियों का पलायन

इस प्रशासनिक अस्थिरता के कारण भारतीय फुटबॉल को भारी आर्थिक चोट लगी है:

  • सिटी फुटबॉल ग्रुप (CFG) का निकास: मैनचेस्टर सिटी के मालिकों ने अनिश्चितता के चलते मुंबई सिटी एफसी में अपनी 65% हिस्सेदारी बेच दी है और भारतीय बाजार से बाहर निकल गए हैं।
  • खिलाड़ियों का इस्तीफा: बोरजा हेरेरा और जेसुस जिमनेज जैसे कई विदेशी सितारों ने वेतन और सुरक्षा के अभाव में अपने क्लबों के साथ अनुबंध तोड़ दिए हैं और भारत छोड़ दिया है।

क्लबों की कड़ी शर्तें

ISL के 14 में से 13 क्लबों ने खेलने की इच्छा तो जताई है, लेकिन उन्होंने AIFF के सामने कड़ी वित्तीय शर्तें रखी हैं। क्लबों की मांग है कि उनसे कोई ‘पार्टिसिपेशन फीस’ न ली जाए और सीजन की पूरी परिचालन लागत की जिम्मेदारी महासंघ उठाए।

निष्कर्ष: एक चौराहे पर खड़ा भारतीय फुटबॉल

भारतीय फुटबॉल अब एक ऐसे मोड़ पर है जहाँ भविष्य पूरी तरह धुंधला है। खिलाड़ियों का एकमात्र संदेश स्पष्ट है: “हम बस फुटबॉल खेलना चाहते हैं, कृपया ऐसा करने में हमारी मदद करें।” अब सबकी निगाहें फीफा के अगले कदम पर टिकी हैं।

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