27 मई 1964 को जवाहरलाल नेहरू के निधन ने भारतीय राजनीति में एक बड़ा शून्य पैदा कर दिया। सवाल सिर्फ़ इतना नहीं था कि अगला प्रधानमंत्री कौन होगा, बल्कि यह भी था कि क्या कांग्रेस पार्टी इस ऐतिहासिक मोड़ पर एकजुट रह पाएगी।

इसी चुनौती के केंद्र में उभरे के. कामराज, जिनकी भूमिका ने 1964 के उत्तराधिकार संकट को दिशा दी।
कामराज: काँग्रेस के अध्यक्ष थे
तमिलनाडु (तत्कालीन मद्रास) से आने वाले कामराज निचली जाति/पिछड़े वर्ग की पृष्ठभूमि से थे। वे मद्रास राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके थे और अपनी सादगी, संगठन क्षमता तथा ‘कामराज प्लान’ के लिए प्रसिद्ध थे। नेहरू के निधन के बाद उन्होंने स्वयं प्रधानमंत्री बनने से इनकार किया और पार्टी में सर्वसम्मति बनाने का दायित्व संभाला।
चार दिन, दो सौ मुलाक़ातें
28 मई 1964 से कामराज ने तेज़ी से परामर्श प्रक्रिया शुरू की। महज़ चार दिनों में उन्होंने लगभग 200 सांसदों, कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों, वरिष्ठ नेताओं और कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों से मुलाक़ात कर उनकी राय जानी। उनका उद्देश्य स्पष्ट था—खुले संघर्ष के बजाय व्यापक सहमति।
दावेदार और आपत्तियाँ
परामर्श के दौरान सबसे मज़बूती से जो नाम सामने आया, वह था मोरारजी देसाई का। वरिष्ठता के बावजूद उनकी आक्रामक कार्यशैली, कठोर निर्णयों और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को लेकर कई नेताओं को आपत्ति थी। नतीजतन, उन्हें अपेक्षित समर्थन नहीं मिला।

सर्वस्वीकृत चेहरा: लाल बहादुर शास्त्री
इसके बाद अधिकांश नेताओं, मुख्यमंत्रियों और सांसदों ने लाल बहादुर शास्त्री का नाम सुझाया। शास्त्री नेहरू के निकट सहयोगी थे, उत्तर प्रदेश से आते थे, कुशल प्रशासक माने जाते थे और उनकी सादगी व सहमति बनाने की क्षमता उन्हें सभी के लिए स्वीकार्य बनाती थी। कामराज का झुकाव भी उनकी ओर रहा, जिससे सर्वसम्मति सुदृढ़ हुई।
निर्णय और विरासत
अंततः 9 जून 1964 को शास्त्री को कांग्रेस संसदीय दल का नेता चुना गया और वे भारत के दूसरे प्रधानमंत्री बने। इस पूरे घटनाक्रम में कामराज की निर्णायक भूमिका के कारण उन्हें भारतीय राजनीति में ‘किंगमेकर’ कहा जाने लगा।
लोकतांत्रिक मिसाल
1964 का यह प्रसंग भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर लोकतांत्रिक परंपराओं और संगठनात्मक परिपक्वता का उत्कृष्ट उदाहरण बना। व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा के बजाय संवाद और सहमति से नेतृत्व चयन—यही इसकी सबसे बड़ी सीख है।
