भारतीय लोकतंत्र की यात्रा में मतदान प्रणाली का विकास एक रोचक और प्रेरक कहानी है। आजादी के बाद पहले आम चुनाव से लेकर आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन तक का यह सफर भारतीय चुनाव आयोग की दूरदर्शिता और तकनीकी प्रगति का प्रतीक है।
पहले आम चुनाव: एक अनोखी चुनौती
1951-52 में हुए भारत के पहले आम चुनाव में मतदान की व्यवस्था आज की तुलना में बिल्कुल अलग थी। उस दौर में अपनाई गई मतपेटी प्रणाली अपने आप में एक अद्भुत प्रयोग था।

मतपेटी प्रणाली की विशेषताएं
पहले चुनाव में हर मतदान केंद्र पर प्रत्येक उम्मीदवार के लिए अलग मतपेटी रखी जाती थी। इन मतपेटियों पर संबंधित उम्मीदवार का चुनाव चिह्न अंकित होता था। मतदाता को एक खाली मतपत्र दिया जाता था, जिसे उसे अपने पसंदीदा उम्मीदवार की मतपेटी में डालना होता था।
इस विशाल लोकतांत्रिक के लिए लगभग 20 लाख स्टील के बक्सों का इस्तेमाल हुआ। यह संख्या अपने आप में उस समय की चुनौतियों को दर्शाती है।
मतपेटियों की तैयारी: एक जटिल प्रक्रिया
एक पदाधिकारी ने मतपेटियों की तैयारी का जो विवरण दिया है, वह उस दौर की मेहनत और समर्पण को दर्शाता है,हर मतपेटी के भीतर और बाहर उम्मीदवार का चुनाव चिह्न अंकित करना पड़ता था
मतपेटी के बाहर उम्मीदवार का नाम तीन भाषाओं में लिखना होता था: उर्दू, हिंदी और अंग्रेजी
चुनाव-क्षेत्र, चुनाव केंद्र और मतदान केंद्र की संख्या दर्ज करनी होती थी
उम्मीदवार के आंकड़ों वाला एक कागजी मुहरबंद पीठासीन पदाधिकारी के दस्तखत के साथ मतपेटी में लगाना पड़ता था,मतपेटी के ढक्कन को तार से बांधकर मुहरबंद किया जाता था
सबसे दिलचस्प बात यह थी कि चुनाव चिह्न और अन्य विवरण दर्ज करने के लिए मतपेटी को पहले सरेस कागज या ईंट के टुकड़े से रगड़ना पड़ता था। यह सारा काम चुनाव की निर्धारित तारीख से ठीक एक दिन पहले करना होता था। छह लोगों को पांच घंटे लगातार काम करना पड़ता था, तब जाकर यह काम पूरा होता था।
मतपत्र प्रणाली: एक क्रांतिकारी बदलाव
शुरुआती दो चुनावों के बाद चुनाव आयोग ने मतदान प्रणाली में महत्वपूर्ण बदलाव किया। अलग-अलग मतपेटियों की जगह अब एक नई व्यवस्था लागू की गई।

नई प्रणाली की खासियत
नए तरीके में मतपत्र पर सभी उम्मीदवारों के नाम और उनके चुनाव चिह्न छपे होते थे। मतदाता को अपने पसंदीदा उम्मीदवार के नाम पर मुहर लगानी होती थी। यह तरीका पिछली व्यवस्था की तुलना में कहीं अधिक सरल और व्यावहारिक था।
यह प्रणाली अगले चालीस वर्षों तक भारतीय चुनावों की रीढ़ बनी रही। इसने कई चुनावी उतार-चढ़ाव देखे और भारतीय लोकतंत्र को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाई।
इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन: तकनीकी क्रांति

1990 के दशक के अंत में भारतीय चुनाव आयोग ने एक और ऐतिहासिक कदम उठाया। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) का प्रयोग शुरू किया गया।
ईवीएम का विस्तार
पहले कुछ चुनावों में सीमित पैमाने पर शुरू हुई ईवीएम प्रणाली धीरे-धीरे पूरे देश में फैल गई। 2004 तक भारत के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ईवीएम का उपयोग शुरू हो चुका था।
ईवीएम के लाभ
इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन ने मतदान प्रक्रिया को कई तरह से सुधारा:
मतगणना में लगने वाला समय काफी कम हो गया
मतपत्रों की छपाई और भंडारण की समस्या खत्म हुई
धोखाधड़ी की संभावना कम हुई
पर्यावरण के अनुकूल विकल्प उपलब्ध हुआ
मतदाताओं के लिए मतदान आसान हुआ
